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इस साल नहीं होगा अब ‘हिमालय का महाकुंभ’ नंदा देवी राजजात यात्रा

चमोली। उत्तराखंड की विश्वप्रसिद्ध नंदा देवी राजजात यात्रा वर्ष 2026 में आयोजित नहीं की जाएगी। धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण इस पदयात्रा को अगले वर्ष 2027 तक स्थगित करने का निर्णय लिया गया है। नंदा देवी राजजात यात्रा को उसकी कठिनता, लंबाई और आध्यात्मिक महत्व के कारण ‘हिमालय का महाकुंभ’ भी कहा जाता है।
नंदा देवी राजजात यात्रा समिति के अध्यक्ष राकेश कुंवर और महासचिव भुवन नौटियाल ने यात्रा स्थगित किए जाने की पुष्टि करते हुए बताया कि उच्च हिमालयी क्षेत्रों में आवश्यक तैयारियां तय समय पर पूरी नहीं हो सकीं। समिति ने सर्वसम्मति से यह निष्कर्ष निकाला कि अधूरी व्यवस्थाओं के बीच यात्रा कराना श्रद्धालुओं की सुरक्षा के लिहाज से उचित नहीं होगा। इसी कारण यात्रा को 2027 तक टालने का फैसला लिया गया।
समिति के अनुसार, यह यात्रा सामान्यतः सितंबर माह में उच्च हिमालयी क्षेत्रों तक पहुंचती है, जहां उस समय भारी बर्फबारी और मौसम के अचानक बिगड़ने की आशंका रहती है। कई निर्जन पड़ावों पर अभी बुनियादी सुविधाएं, आवागमन मार्ग और सुरक्षा इंतजाम पूरे नहीं हो पाए हैं। ऐसे में यात्रियों की सुरक्षा और सुविधा दोनों प्रभावित हो सकती थीं।
समिति ने जानकारी दी कि 23 जनवरी को चमोली जिले के नौटी गांव में मनौती का पारंपरिक कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा। इसी अवसर पर वर्ष 2027 में प्रस्तावित नंदा देवी राजजात यात्रा की औपचारिक घोषणा की जाएगी। शुभ मुहूर्त के अनुसार पहली बार विधिवत संकल्प भी लिया गया है और यात्रा से जुड़े कई अहम प्रस्ताव शासन को भेजे जाएंगे।
चमोली के जिलाधिकारी गौरव कुमार ने कहा कि प्रशासन को फिलहाल समिति की ओर से कोई औपचारिक सूचना प्राप्त नहीं हुई है। उन्होंने स्पष्ट किया कि प्रशासन का दायित्व यात्रा को सुरक्षित और सुव्यवस्थित ढंग से संपन्न कराना है और इसके लिए पूरी तैयारी की जाएगी। आपदा की संभावनाओं को देखते हुए प्रशासन ने समिति को तिथि निर्धारण के संबंध में पत्र भी भेजा था। अंतिम निर्णय 23 जनवरी को औपचारिक रूप से सामने आ सकता है। उल्लेखनीय है कि नंदा देवी राजजात यात्रा चमोली जिले के नौटी गांव से प्रारंभ होती है और चार सींग वाले विशेष खाडू (चौसिंगा) की अगुवाई में आगे बढ़ती है। यह उत्तराखंड की सबसे लंबी और चुनौतीपूर्ण धार्मिक पैदल यात्राओं में से एक मानी जाती है, जो श्रद्धालुओं के लिए आस्था, परंपरा और साहस का अनुपम प्रतीक है।

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